Wednesday, September 28, 2016

तहज़ीब के खण्डहर 

आज के बिगड़े हुए माहौल के मंजर न दो 
ये तो खिलते फूल है, डाकुओ के चम्बल न दो 

ये अभी बच्चे है, अपनी काट लेंगे अंगुलियाँ 
हाथ में इनके कोई चाक़ू या ख़ंजर न दो 

इनकी आँखों में अभी जलते है ख्वाबो के दिए 
इन निगाहों में अभी धुल के अंधड़ न दो 

ये न हो दुनिया के जंगल में भटकते रहे 
रास्ता इन्हें कोई तो दो चाहे कोई मंजिल न दो 

ये तुम्हे देख कर सीखेंगे जीने का चलन 
तुम विरासत में इन्हें तहज़ीब के खण्डहर ना दो 

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