Sunday, January 8, 2017

सोच 

आदमी की सोच को क्या हो गया 
खज़ाना इंसानियत का,उससे भी खो गया  
प्यार करना था,उसे अपनी ज़मीन से 
नफरत करने लगा है,वो अपने ज़मीर से 
पाप की खंदकों में,वो जाकर सो गया 
जिसका वो अंश था,उससे दूर हो गया 
तिरस्कार करने लगा,वो मजबूर हो गया 
दरिंदा बन गया,वो उससे यह क्या हो गया 
जगत के जीवो का,वो दुसमन हो गया 
अब तो जाग जा आदमी,तू क्यों सो गया 
दया धर्म शांति से,विमुख क्यों हो गया 
अपनी धरा से,प्रेम और जनो से प्यार कर 
अब तो अच्छी सोच का, इंसान तू बनजा