Thursday, October 13, 2016

लो चलो, आज मैं
बांध ही दू अपनी सांसो पे
तेरे लिए, छोटा सा मन्नत का धागा।
नाम तेरा लेकर कह दू धड़कन को,
देख तुझसे ही जा उलझा,
मेरे मोह का ये धागा

चाँद मलिन सा हो जाये क्यू फिर सूरज
आँख चुराए,
मेरे मन्नत की ताक़त से कभी, तुझपे
आंच न आये।
रूह छुपा के डोले तुझको जब काली
नज़रे जो भरमाए।
हाथो पर बरबस खिंच आते है आभारी
रेखाओ के साये।

पांव जहा भी पड़  जाये तेरे, मेरे रोम-रोम   
के तारे गुजरे,
अनहोनी की चिट्ठियों को लेकर,मैं
ऐसी गांठ लगा दू,
मन्नत की जंजीर बना दूँ
                                          निशा

Thursday, October 6, 2016

बैठे-बैठे क्या कर बैठी
खुद से ही झगड़ा कर बैठी

अपनों से शिकवा कर बैठी
क्या करना था क्या कर बैठी
 
 लाख छिपाया खुद को जिससे
उसको ही अपना कर बैठी

इक रहजन के जिम्मे देखो
मै सारा  रस्ता कर बैठी

उसकी इज़्ज़त की खातिर मै
खुद को ही रुस्वा कर बैठी

रिस्तो की जद में रहना था
किस -किस को सजदा कर बैठी   
   -
                                           सुसीला   शिवराण

                      

Saturday, October 1, 2016

एक बेटी होने का दर्द कौन जाने ?
न हवा जाने,न पानी जाने
बेटी का जन्म एक आँगन में
पौधे की तरह होती है
माली सा माँ बाप सींचता है
निहारते है दुलारते है पौधे को
पौधा होता है बड़ा ऊँचा,
फूल आ जाते है
फल आने की होती तैयारी
तब माली से माली से माँ बाप
भरे-पुरे पौधे को
काटकर सौंप देते है दूसरे को सजाने
रोटी बिलखती बेटी चली जाती है
आँगन दूसरे सोचकर की
दस्तूर है दुनिया का नया क्या है?
बिछड़ने में प्रतिपल झेलती है टीस बिछड़ने की
रिसते है आँसू अंदर ही अंदर
गिरते है सीधे दिल  पर
एक पौधे छिटकाकर फूल
दूसरे पौधे पर आखिर कितनी
कुशलता से रूप जा सकता है
फिर एक दिन माँ बनती बेटी रोती है
बेटी के जन्म पर इसलिए नहीं की
वो बेटी क्यों है
की बेटी से पौधे को सींचकर
दुलार कर किसी और के
आँगन में रोपना है
जख्म फिर से हरे भरे हो जाते है
तीखा हो जाता है बेटी होने का दर्द