एक बेटी होने का दर्द कौन जाने ?
न हवा जाने,न पानी जाने
बेटी का जन्म एक आँगन में
पौधे की तरह होती है
माली सा माँ बाप सींचता है
निहारते है दुलारते है पौधे को
पौधा होता है बड़ा ऊँचा,
फूल आ जाते है
फल आने की होती तैयारी
तब माली से माली से माँ बाप
भरे-पुरे पौधे को
काटकर सौंप देते है दूसरे को सजाने
रोटी बिलखती बेटी चली जाती है
आँगन दूसरे सोचकर की
दस्तूर है दुनिया का नया क्या है?
बिछड़ने में प्रतिपल झेलती है टीस बिछड़ने की
रिसते है आँसू अंदर ही अंदर
गिरते है सीधे दिल पर
एक पौधे छिटकाकर फूल
दूसरे पौधे पर आखिर कितनी
कुशलता से रूप जा सकता है
फिर एक दिन माँ बनती बेटी रोती है
बेटी के जन्म पर इसलिए नहीं की
वो बेटी क्यों है
की बेटी से पौधे को सींचकर
दुलार कर किसी और के
आँगन में रोपना है
जख्म फिर से हरे भरे हो जाते है
तीखा हो जाता है बेटी होने का दर्द
न हवा जाने,न पानी जाने
बेटी का जन्म एक आँगन में
पौधे की तरह होती है
माली सा माँ बाप सींचता है
निहारते है दुलारते है पौधे को
पौधा होता है बड़ा ऊँचा,
फूल आ जाते है
फल आने की होती तैयारी
तब माली से माली से माँ बाप
भरे-पुरे पौधे को
काटकर सौंप देते है दूसरे को सजाने
रोटी बिलखती बेटी चली जाती है
आँगन दूसरे सोचकर की
दस्तूर है दुनिया का नया क्या है?
बिछड़ने में प्रतिपल झेलती है टीस बिछड़ने की
रिसते है आँसू अंदर ही अंदर
गिरते है सीधे दिल पर
एक पौधे छिटकाकर फूल
दूसरे पौधे पर आखिर कितनी
कुशलता से रूप जा सकता है
फिर एक दिन माँ बनती बेटी रोती है
बेटी के जन्म पर इसलिए नहीं की
वो बेटी क्यों है
की बेटी से पौधे को सींचकर
दुलार कर किसी और के
आँगन में रोपना है
जख्म फिर से हरे भरे हो जाते है
तीखा हो जाता है बेटी होने का दर्द
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