Sunday, September 18, 2016

उत्तर...

इस एक बून्द आंसू में  
चाए सम्राजय बहा दो 
वरदानो की वर्षा से 
यह सूनापन बिखरा दो

इच्छाओ की कम्पन से 
सोता एकान्त जगा दो,
आशा की मुस्कुराहट पर
मेरा नैराश्य लूट दो।

चाहे जर्ज़र तारो में 
अपना  मानस उलझा दो,
इन पलकों के प्यालो में
सुख का आसव झलका दो

मेरे बिखरे प्राणों में
सारी करुणा ढुलका दो,
मेरी छोटी सीमा में 
अपना अस्तित्व मिटा दो।

पर शेष नहीं होगी यह
मेरे प्राणों की क्रीड़ा,
तुमको पीड़ा में ढूंढा
तुम में ढूंढगी पीड़ा।

-महादेवी वर्मा 

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