जीवन बाती जीवन बाती जलती जाती कभी रेख सी घी में जलती धीमे धीमे बाट पिघलती कभी हवा के झोंके खाती लौ यह पल पल कंपती जाती
Poems
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Wednesday, January 3, 2018
Sunday, January 8, 2017
सोच
आदमी की सोच को क्या हो गया
खज़ाना इंसानियत का,उससे भी खो गया
प्यार करना था,उसे अपनी ज़मीन से
नफरत करने लगा है,वो अपने ज़मीर से
पाप की खंदकों में,वो जाकर सो गया
जिसका वो अंश था,उससे दूर हो गया
तिरस्कार करने लगा,वो मजबूर हो गया
दरिंदा बन गया,वो उससे यह क्या हो गया
जगत के जीवो का,वो दुसमन हो गया
अब तो जाग जा आदमी,तू क्यों सो गया
दया धर्म शांति से,विमुख क्यों हो गया
अपनी धरा से,प्रेम और जनो से प्यार कर
अब तो अच्छी सोच का, इंसान तू बनजा
Thursday, October 13, 2016
लो चलो, आज मैं
बांध ही दू अपनी सांसो पे
तेरे लिए, छोटा सा मन्नत का धागा।
नाम तेरा लेकर कह दू धड़कन को,
देख तुझसे ही जा उलझा,
मेरे मोह का ये धागा
चाँद मलिन सा हो जाये क्यू फिर सूरज
आँख चुराए,
मेरे मन्नत की ताक़त से कभी, तुझपे
आंच न आये।
रूह छुपा के डोले तुझको जब काली
नज़रे जो भरमाए।
हाथो पर बरबस खिंच आते है आभारी
रेखाओ के साये।
पांव जहा भी पड़ जाये तेरे, मेरे रोम-रोम
के तारे गुजरे,
अनहोनी की चिट्ठियों को लेकर,मैं
ऐसी गांठ लगा दू,
मन्नत की जंजीर बना दूँ
निशा
बांध ही दू अपनी सांसो पे
तेरे लिए, छोटा सा मन्नत का धागा।
नाम तेरा लेकर कह दू धड़कन को,
देख तुझसे ही जा उलझा,
मेरे मोह का ये धागा
चाँद मलिन सा हो जाये क्यू फिर सूरज
आँख चुराए,
मेरे मन्नत की ताक़त से कभी, तुझपे
आंच न आये।
रूह छुपा के डोले तुझको जब काली
नज़रे जो भरमाए।
हाथो पर बरबस खिंच आते है आभारी
रेखाओ के साये।
पांव जहा भी पड़ जाये तेरे, मेरे रोम-रोम
के तारे गुजरे,
अनहोनी की चिट्ठियों को लेकर,मैं
ऐसी गांठ लगा दू,
मन्नत की जंजीर बना दूँ
निशा
Thursday, October 6, 2016
Saturday, October 1, 2016
एक बेटी होने का दर्द कौन जाने ?
न हवा जाने,न पानी जाने
बेटी का जन्म एक आँगन में
पौधे की तरह होती है
माली सा माँ बाप सींचता है
निहारते है दुलारते है पौधे को
पौधा होता है बड़ा ऊँचा,
फूल आ जाते है
फल आने की होती तैयारी
तब माली से माली से माँ बाप
भरे-पुरे पौधे को
काटकर सौंप देते है दूसरे को सजाने
रोटी बिलखती बेटी चली जाती है
आँगन दूसरे सोचकर की
दस्तूर है दुनिया का नया क्या है?
बिछड़ने में प्रतिपल झेलती है टीस बिछड़ने की
रिसते है आँसू अंदर ही अंदर
गिरते है सीधे दिल पर
एक पौधे छिटकाकर फूल
दूसरे पौधे पर आखिर कितनी
कुशलता से रूप जा सकता है
फिर एक दिन माँ बनती बेटी रोती है
बेटी के जन्म पर इसलिए नहीं की
वो बेटी क्यों है
की बेटी से पौधे को सींचकर
दुलार कर किसी और के
आँगन में रोपना है
जख्म फिर से हरे भरे हो जाते है
तीखा हो जाता है बेटी होने का दर्द
न हवा जाने,न पानी जाने
बेटी का जन्म एक आँगन में
पौधे की तरह होती है
माली सा माँ बाप सींचता है
निहारते है दुलारते है पौधे को
पौधा होता है बड़ा ऊँचा,
फूल आ जाते है
फल आने की होती तैयारी
तब माली से माली से माँ बाप
भरे-पुरे पौधे को
काटकर सौंप देते है दूसरे को सजाने
रोटी बिलखती बेटी चली जाती है
आँगन दूसरे सोचकर की
दस्तूर है दुनिया का नया क्या है?
बिछड़ने में प्रतिपल झेलती है टीस बिछड़ने की
रिसते है आँसू अंदर ही अंदर
गिरते है सीधे दिल पर
एक पौधे छिटकाकर फूल
दूसरे पौधे पर आखिर कितनी
कुशलता से रूप जा सकता है
फिर एक दिन माँ बनती बेटी रोती है
बेटी के जन्म पर इसलिए नहीं की
वो बेटी क्यों है
की बेटी से पौधे को सींचकर
दुलार कर किसी और के
आँगन में रोपना है
जख्म फिर से हरे भरे हो जाते है
तीखा हो जाता है बेटी होने का दर्द
Thursday, September 29, 2016
Wednesday, September 28, 2016
तहज़ीब के खण्डहर
आज के बिगड़े हुए माहौल के मंजर न दो
ये तो खिलते फूल है, डाकुओ के चम्बल न दो
ये अभी बच्चे है, अपनी काट लेंगे अंगुलियाँ
हाथ में इनके कोई चाक़ू या ख़ंजर न दो
इनकी आँखों में अभी जलते है ख्वाबो के दिए
इन निगाहों में अभी धुल के अंधड़ न दो
ये न हो दुनिया के जंगल में भटकते रहे
रास्ता इन्हें कोई तो दो चाहे कोई मंजिल न दो
ये तुम्हे देख कर सीखेंगे जीने का चलन
तुम विरासत में इन्हें तहज़ीब के खण्डहर ना दो
आज के बिगड़े हुए माहौल के मंजर न दो
ये तो खिलते फूल है, डाकुओ के चम्बल न दो
ये अभी बच्चे है, अपनी काट लेंगे अंगुलियाँ
हाथ में इनके कोई चाक़ू या ख़ंजर न दो
इनकी आँखों में अभी जलते है ख्वाबो के दिए
इन निगाहों में अभी धुल के अंधड़ न दो
ये न हो दुनिया के जंगल में भटकते रहे
रास्ता इन्हें कोई तो दो चाहे कोई मंजिल न दो
ये तुम्हे देख कर सीखेंगे जीने का चलन
तुम विरासत में इन्हें तहज़ीब के खण्डहर ना दो
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